भगवान की भक्ति के नौ स्वरूप मानव जीवन को सरल, सात्विक और ईश्वरमय बनाते हैं — महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश दास उदासीन
राम-भरत मिलाप प्रसंग सुन श्रद्धालु हुए भावविभोर, “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंजा वातावरण
मोनू सुरेश छीपा। द वॉयस ऑफ राजस्थान
भीलवाड़ा, 24 मई।
सनातन सेवा समिति के तत्वावधान एवं के सानिध्य में हरि शेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में अधिकमास के अवसर पर चल रहे सेवा-सुमिरन प्रकल्प एवं पुरुषोत्तम माह महोत्सव के अंतर्गत आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिवस ने भगवान श्रीराम के वनवास एवं राम-भरत मिलाप प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान भजनों की मधुर प्रस्तुतियों और ओजस्वी प्रवचनों से पूरा सभागार भक्तिमय वातावरण में डूब गया।
व्यासपीठ से स्वामी जगदीश दास उदासीन ने कहा कि भगवान श्रीराम मर्यादा, विनम्रता और आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। परमात्मा सर्वज्ञ होते हुए भी अपनी लीलाओं में दूसरों को श्रेय देकर मानव समाज को विनम्रता का संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम स्वयं सब कुछ जानते थे, फिर भी वन गमन के दौरान ऋषि-मुनियों से मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए आगे बढ़े।
वनवास प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वन की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब वे महर्षि भारद्वाज के आश्रम पहुंचे और अत्यंत विनम्रता के साथ आगे का मार्ग पूछा। भगवान का यह आचरण मानव जीवन को यह शिक्षा देता है कि ज्ञान और सामर्थ्य होने पर भी बड़ों एवं संतों का सम्मान करना चाहिए।
इसके पश्चात स्वामीजी ने वाल्मीकि आश्रम प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम ने महर्षि वाल्मीकि से वन में निवास हेतु उपयुक्त स्थान के बारे में पूछा। तब महर्षि वाल्मीकि ने चित्रकूट में निवास करने का सुझाव दिया। कथा में चित्रकूट की महिमा, वहां के प्राकृतिक सौंदर्य और तपोभूमि के महत्व का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया।
कथा के दौरान चित्रकूट में राम-भरत मिलाप का मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए स्वामी जगदीश दास ने बताया कि किस प्रकार भरतजी ने श्रीराम से अयोध्या लौटने का आग्रह किया, लेकिन भगवान श्रीराम ने पिता के वचन और धर्म पालन को सर्वोपरि मानते हुए वनवास पूर्ण करने का संकल्प निभाया। भरत और श्रीराम के प्रेम, त्याग एवं भाईचारे के इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं की आंखें नम कर दीं।
महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश दास ने सती अनुसुइया प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि माता अनुसुइया ने माता सीता को नारी धर्म, पतिव्रत और आदर्श गृहस्थ जीवन की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को परिवार की मर्यादा और संस्कारों की धुरी माना गया है।
कथा में नवधा भक्ति का भी विस्तार से वर्णन किया गया। स्वामीजी ने कहा कि भगवान की भक्ति के नौ स्वरूप मानव जीवन को सरल, सात्विक और ईश्वरमय बनाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से भक्ति, सेवा, सत्संग एवं नामस्मरण को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।
कथा के दौरान प्रस्तुत भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे तथा पूरा वातावरण “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंजायमान हो उठा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और कथा श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
आज आयोजित विष्णु यज्ञ में राजा-वर्षा टिकयानी एवं वंदना-सुरेश केशवानी ने अपने वैवाहिक वर्षगांठ अवसर पर आहुतियां दीं। वहीं रुद्राभिषेक में हीरालाल गुरनानी के पुत्री-दामाद ने महादेव का अभिषेक किया।
पुरुषोत्तम माह महोत्सव के अंतर्गत आश्रम में प्रतिदिन विष्णु यज्ञ, रुद्राभिषेक, संकीर्तन, गंगा आरती एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हो रहे हैं। आश्रम के संत एवं ने श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में भीलवाड़ा में बह रही धर्मगंगा की त्रिवेणी का लाभ लेने का आग्रह किया।


