भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव में भाजपा के टिकट को लेकर घमासान—क्यों मची है मारामारी, क्या कहता है यह संकेत?
टिकट की दावेदारी से लेकर विरोध तक तेज हुई सियासी हलचल, हर वार्ड में कई दावेदार—क्या भाजपा की मजबूत स्थिति का संकेत है यह तस्वीर?
भीलवाड़ा, 28 अगस्त। नगर निगम चुनाव का बिगुल बजते ही भीलवाड़ा की सियासत में हलचल तेज हो गई है। भाजपा की ओर से प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के बीच टिकट को लेकर दावेदारों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई वार्डों में एक टिकट के लिए अनेक कार्यकर्ता दावेदारी जता रहे हैं। टिकट नहीं मिलने की स्थिति में कुछ दावेदारों और समर्थकों की नाराजगी भी खुलकर सामने आने लगी है।
भाजपा कार्यालय के बाहर धरना, टिकट को लेकर विरोध और वरिष्ठ नेताओं के सामने अपनी दावेदारी रखने की घटनाओं ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘बगावत’ के रूप में देखना कितना सही है? इसके पीछे भाजपा के पक्ष में जाने वाले कुछ राजनीतिक संकेत भी दिखाई दे रहे हैं।
सवाल बड़ा है—भाजपा में ही टिकट के लिए इतनी मारामारी क्यों?
1. क्योंकि दावेदारों को जीत की उम्मीद दिखाई दे रही है
राजनीति में सामान्य धारणा है कि जिस पार्टी के टिकट पर जीत की संभावना अधिक दिखाई देती है, उसी पार्टी में टिकट की मांग भी सबसे ज्यादा होती है।
भीलवाड़ा में भाजपा का संगठन लंबे समय से बूथ स्तर तक सक्रिय रहा है। ऐसे में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को लगता है कि भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरने से उनकी जीत की संभावना मजबूत हो सकती है।
यही कारण है कि एक वार्ड में कई-कई दावेदार सामने आ रहे हैं।
अगर पार्टी कमजोर दिखाई देती तो टिकट के लिए इतनी प्रतिस्पर्धा शायद ही देखने को मिलती।
2. 70 वार्डों में टिकट की सीमित संख्या, दावेदार अनेक
नगर निगम में वार्डों की संख्या सीमित है, लेकिन भाजपा के पास लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की बड़ी संख्या है।
हर दावेदार अपने सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत संपर्क, संगठन में सक्रियता और वार्ड में पकड़ के आधार पर खुद को मजबूत उम्मीदवार मान रहा है।
यही कारण है कि टिकट वितरण के समय स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धा बढ़ना तय है।
3. विरोध को पूरी तरह बगावत मानना भी सही नहीं
टिकट की दावेदारी करना और टिकट नहीं मिलने पर नाराजगी व्यक्त करना राजनीति में नई बात नहीं है।
भाजपा जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टी में अलग-अलग कार्यकर्ताओं की अपनी आकांक्षाएं हैं। कोई वर्षों से संगठन में काम कर रहा है, कोई सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय है तो कोई लगातार चुनावी गतिविधियों में अपनी भूमिका निभाता आया है।
ऐसे में टिकट नहीं मिलने पर असंतोष सामने आना स्वाभाविक है।
लेकिन असली परीक्षा टिकट घोषित होने के बाद होगी—कौन पार्टी के फैसले को स्वीकार करता है और कौन निर्दलीय मैदान में उतरता है।
4. टिकट की लड़ाई कहीं भाजपा की मजबूती का संकेत तो नहीं?
राजनीतिक जानकारों की नजर में टिकट को लेकर इतनी अधिक दावेदारी को भाजपा की चुनावी संभावनाओं से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
क्योंकि राजनीति में कार्यकर्ता उसी मंच पर अपनी राजनीतिक संभावना देखता है, जहां उसे जीत की उम्मीद नजर आती है।
भीलवाड़ा में भाजपा के भीतर टिकट के लिए चल रही प्रतिस्पर्धा को इसी नजरिए से देखने वाले लोग इसे संगठन की सक्रियता और चुनाव को लेकर कार्यकर्ताओं के उत्साह का संकेत मान रहे हैं।
क्या नगर निगम में भाजपा बोर्ड की वापसी होगी?
इस सवाल का जवाब फिलहाल चुनाव परिणाम ही देगा। टिकट वितरण के बाद नाराज कार्यकर्ताओं की भूमिका, निर्दलीय प्रत्याशियों की स्थिति, स्थानीय समीकरण और वार्डवार उम्मीदवारों की ताकत परिणाम को प्रभावित करेगी।
लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के भीतर टिकट को लेकर जिस स्तर की हलचल दिखाई दे रही है, उससे यह साफ है कि नगर निगम चुनाव को लेकर पार्टी के कार्यकर्ताओं और दावेदारों में जबरदस्त उत्साह है।
अब भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—सही चेहरे का चयन करना और टिकट से वंचित दावेदारों को साथ लेकर चलना।
यदि टिकट वितरण के बाद नाराज दावेदारों को संगठन के साथ जोड़ लिया गया तो यही वर्तमान प्रतिस्पर्धा चुनाव के दौरान भाजपा के लिए बड़ी ताकत बन सकती है।
निष्कर्ष
टिकट के लिए मारामारी को केवल बगावत के चश्मे से देखना जल्दबाजी होगी। यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा, संगठन की सक्रियता और चुनावी संभावनाओं—तीनों का मिश्रण हो सकता है।
अब नजर भाजपा की टिकट सूची पर है। टिकट घोषित होने के बाद पता चलेगा कि वर्तमान दावेदारी कितनी आसानी से समर्थन में बदलती है और कितने दावेदार पार्टी के फैसले के साथ खड़े रहते हैं।
भीलवाड़ा नगर निगम की सत्ता के लिए मुकाबला दिलचस्प होने के साथ-साथ भाजपा के लिए संगठनात्मक एकजुटता की भी बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।



