शाहपुरा भाजपा में टिकट की आहट से पहले ही बगावत के सुर तेज!
अपने वार्ड के जिताऊ चेहरे दरकिनार हुए तो बढ़ सकता है विरोध—दूसरे वार्ड के ‘सिफारशी’ प्रत्याशियों को टिकट देने की चर्चा से कार्यकर्ताओं में नाराजगी
शाहपुरा, 29 अगस्त। मोनू सुरेश छीपा। द वॉयस ऑफ राजस्थान
शाहपुरा नगर पालिका चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी में टिकट वितरण से पहले ही अंदरूनी खींचतान और असंतोष के संकेत दिखाई देने लगे हैं। टिकटों की घोषणा से पहले ही कई वार्डों में संभावित प्रत्याशियों को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच चर्चाओं का दौर तेज है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या पार्टी जमीन से जुड़े और लगातार सक्रिय कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देगी या सिफारिश और व्यक्तिगत पसंद टिकट वितरण पर भारी पड़ेगी?
पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर नाराजगी बताई जा रही है कि यदि किसी वार्ड में लंबे समय से सक्रिय, मजबूत जनाधार वाले और चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले कार्यकर्ता को दरकिनार कर किसी दूसरे वार्ड के व्यक्ति अथवा केवल सिफारिश के आधार पर पसंदीदा चेहरे को टिकट दिया गया, तो इसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है।
‘वार्ड हमारा, प्रत्याशी दूसरे वार्ड का’—तो कार्यकर्ता क्यों स्वीकार करेगा?
कार्यकर्ताओं के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उन संभावित परिस्थितियों को लेकर है, जहां किसी वार्ड में संगठन के पदाधिकारी, जिला पदाधिकारी, मंडल पदाधिकारी और बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता मौजूद हों, लेकिन टिकट किसी दूसरे वार्ड के व्यक्ति या किसी प्रभावशाली सिफारिश के आधार पर तय कर दिया जाए।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव केवल टिकट से नहीं, बल्कि बूथ पर खड़े रहने वाले कार्यकर्ताओं के दम पर जीता जाता है। ऐसे में यदि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता को नजरअंदाज किया गया तो उसके समर्थकों और स्थानीय संगठन में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
‘पार्टी में लोकतंत्र कहां बचा?’—उठने लगे सवाल
कुछ कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी उठने लगा है कि यदि वार्ड स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठन की राय को महत्व नहीं दिया गया तो फिर टिकट चयन की प्रक्रिया में लोकतांत्रिक भागीदारी का क्या अर्थ रह जाएगा?
कार्यकर्ताओं का मानना है कि प्रत्याशी ऐसा होना चाहिए जिसे वार्ड का मतदाता पहचानता हो, जिसके साथ स्थानीय कार्यकर्ता खड़े हों और जिसकी जीत की वास्तविक संभावना हो। केवल राजनीतिक सिफारिश, व्यक्तिगत पसंद या किसी गुट के प्रभाव में टिकट वितरण किया गया तो यह पार्टी के लिए चुनावी तौर पर महंगा साबित हो सकता है।
टिकट घोषित होते ही सामने आएगी असली तस्वीर!
फिलहाल भाजपा में टिकट वितरण को लेकर अंदरखाने बैठकों, मुलाकातों और दावेदारों की सक्रियता का दौर जारी है। हर दावेदार अपने पक्ष में समीकरण मजबूत करने में जुटा है। लेकिन असली तस्वीर टिकटों की घोषणा के बाद ही सामने आएगी।
यदि पार्टी ने स्थानीय और मजबूत दावेदारों को प्राथमिकता दी, तो नाराजगी को काफी हद तक रोका जा सकता है। लेकिन यदि कई वार्डों में स्थानीय दावेदारों को दरकिनार कर दूसरे वार्डों से प्रत्याशी उतारे गए अथवा सिफारिशी चेहरों को प्राथमिकता मिली तो बगावत, निर्दलीय मैदान में उतरने और भीतरघात जैसी चुनौतियां भाजपा के सामने खड़ी हो सकती हैं।
सबसे बड़ा सवाल—टिकट जीतने वाले को मिलेगा या ‘सिफारिश’ वाले को?
शाहपुरा भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा टिकट वितरण की है। पार्टी के सामने एक तरफ पुराने, सक्रिय और जमीन से जुड़े कार्यकर्ता हैं, तो दूसरी तरफ टिकट के लिए मजबूत सिफारिश और राजनीतिक संपर्क रखने वाले दावेदारों की चर्चा है।
ऐसे में अब सभी की नजरें भाजपा के टिकट चयन पर टिकी हैं।
क्योंकि टिकट की घोषणा सिर्फ प्रत्याशी तय नहीं करेगी—यह तय करेगी कि शाहपुरा भाजपा में कार्यकर्ताओं की आवाज कितनी सुनी गई और आने वाले नगर पालिका चुनाव में संगठन कितना एकजुट होकर मैदान में उतरता है।
क्या टिकट वितरण के बाद भाजपा में असंतोष शांत होगा या बगावत खुले मैदान में दिखाई देगी?
क्या स्थानीय जिताऊ चेहरों पर भरोसा होगा या सिफारिशी नाम बाजी मारेंगे?
इन सवालों का जवाब आने वाले कुछ घंटों में शाहपुरा की राजनीतिक तस्वीर को काफी हद तक साफ कर सकता है।


