संपादकीय | पार्टियों में टिकट की लड़ाई, निर्दलियों की मौज!
टिकट के लिए अपनों में घमासान, बगावत की आहट और निर्दलीय उम्मीदवारों के चेहरे पर मुस्कान… आखिर नगर निकाय चुनाव में यह कैसी सियासत?
नगर पालिका चुनाव आते ही राजनीति का मौसम भी बदल गया है। जो कल तक एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पार्टी का झंडा उठा रहे थे, आज वही टिकट की कतार में एक-दूसरे के सामने खड़े नजर आ रहे हैं। कहीं वार्ड बदलकर टिकट देने की चर्चा है तो कहीं वर्षों से जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ता टिकट की दौड़ में पीछे छूटता दिखाई दे रहा है।
और यही स्थिति निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए किसी सुनहरे अवसर से कम नहीं।
पार्टियों के भीतर चल रही टिकट की खींचतान का सबसे बड़ा फायदा किसे होगा? जाहिर है—उसे, जो पार्टी के झगड़े से बाहर खड़ा होकर जनता के बीच अपना चेहरा लेकर जाएगा।
व्यंग्य की भाषा में कहें तो—पार्टियां टिकट बांटने में उलझी हैं और निर्दलीय वोट बांटने की तैयारी में हैं!
लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है—क्या टिकट वितरण केवल सिफारिश, समीकरण और प्रभाव के आधार पर होगा या फिर वार्ड में जीतने की क्षमता, कार्यकर्ता की सक्रियता और जनता के बीच उसकी पकड़ को भी महत्व मिलेगा?
क्योंकि चुनाव कार्यालय में बैठकर बनाई गई सूची और जमीन पर जनता के बीच बनी पसंद—दोनों हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।
अगर किसी वार्ड में पार्टी का मजबूत कार्यकर्ता टिकट से वंचित होता है और वह नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतरता है, तो मुकाबला केवल दो प्रत्याशियों के बीच नहीं रहता। फिर लड़ाई पार्टी बनाम पार्टी नहीं, बल्कि पार्टी बनाम अपने ही पुराने कार्यकर्ता की बन जाती है।
और राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—
जिस कार्यकर्ता ने पांच साल पार्टी का झंडा उठाया, अगर टिकट के समय वही झंडा छोड़कर निर्दलीय झंडा उठा ले तो सवाल सिर्फ कार्यकर्ता से नहीं, टिकट देने वालों से भी पूछा जाएगा।
आखिर चुनाव जनता लड़ाती है, संगठन नहीं।
टिकट पार्टी देती है, लेकिन जीत का फैसला मतदाता करता है।
अब देखना यह है कि टिकट के लिए पार्टियों में चल रही लड़ाई किसके लिए संकट बनेगी और किस निर्दलीय की निकल पड़ेगी!
मोनू सुरेश छीपा। द वॉयस ऑफ राजस्थान


