सामान्य सीटों पर OBC का बोलबाला, आरक्षित वार्ड में स्थानीय दावेदारों की बारी क्यों नहीं? शाहपुरा भाजपा के टिकट वितरण पर उठे सवाल—पैनल में 18 सामान्य/सामान्य महिला वार्ड, 12 पर OBC प्रत्याशी; कार्यकर्ताओं में चर्चा, ‘वार्ड का फॉर्म या सिफारिश का फॉर्म?’
शाहपुरा। नगर पालिका चुनाव को लेकर भाजपा के प्रत्याशी पैनल की तस्वीर सामने आने के बाद पार्टी के अंदर ही टिकट वितरण को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। खास बात यह है कि पार्टी के घोषित पैनल में सामान्य एवं सामान्य महिला श्रेणी के 18 वार्डों में से 12 वार्डों में OBC वर्ग के प्रत्याशियों को स्थान मिला है।
अब इसे भाजपा की सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति माना जाए या फिर वार्ड स्तर के समीकरणों की अनदेखी—यह तो पार्टी के रणनीतिकार ही बेहतर बता सकते हैं। लेकिन जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच सवाल जरूर तैर रहा है कि जब वार्ड सामान्य है तो स्थानीय कार्यकर्ता की दावेदारी कितनी महत्वपूर्ण है और सामाजिक समीकरण कितना?
व्यंग्य में कहें तो—‘वार्ड सामान्य है, लेकिन टिकट का मूड OBC है!’
शाहपुरा के टिकट पैनल को देखकर राजनीतिक गलियारों में एक नया गणित चर्चा में है।
सामान्य सीट = सामान्य वर्ग का टिकट, यह पुराना फार्मूला शायद अब चुनावी राजनीति की किताब का पिछला अध्याय बनता जा रहा है।
नया फार्मूला कुछ यूं नजर आ रहा है—
“सीट सामान्य हो सकती है, लेकिन टिकट सामान्य होना जरूरी नहीं!”
पैनल के मुताबिक वार्ड 1, 3, 4, 7, 8, 14, 21, 25, 28, 29, 30 और 34 जैसे सामान्य/सामान्य महिला वार्डों में OBC वर्ग के प्रत्याशियों को जगह मिली है।
राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व जरूरी है और भाजपा भी सामाजिक समरसता की बात करती रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सामाजिक समीकरण बनाते समय वार्ड की स्थानीय राजनीतिक जमीन, वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता और उसकी स्वीकार्यता का भी उतना ही आकलन हुआ?


