*कैसे होगी स्वतंत्र पत्रकारिता,हकीकत का आईना दिखाने वाले नहीं प्रंशसा की गाथा लिखने वाले लगते अच्छे*
*सोशल मीडिया के दौर में स्वतंत्र प्रेस व पत्रकारिता की मुश्किले होती जा रही राह, बढ़ती जा रही चुनौतियां*
*निलेश कांठेड़*
हम आज प्रेस स्वतंत्रता दिवस मना रहे है। नेता से लेकर अधिकारी और समाजसेवियों से लेकर बुद्धिजीवी तक स्वयं को स्वतंत्र प्रेस का समर्थक बताते हुए ‘प्रेस फ्रीडम दिवस’ की बधाईयां बांट रहे है। बधाईयां बांटने वाले और स्वीकार करने वाले दोनों ही मन ही मन हकीकत जान रहे लेकिन दुनिया को दिखाने के लिए प्रेस स्वतंत्रता दिवस मना रहे। मैने भी अब तक करीब 25 वर्ष पत्रकारिता क्षेत्र में गुजारे है और उस अनुभव के नाते ये कहने में कोई हिचक नहीं रखता हूं कि स्वतंत्र पत्रकारिता एवं लेखन चाहते सभी है लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए। कोई अपनी खामियां उजागर कर दे तो कल तक जिस कलम की तारीफों के पुल बांधते थे उसी में खामियों का ढेर दिखने लगने लग जाता है। अधिकतर नेता हो या अधिकारी या फिर सामाजिक संगठन ओर समाजसेवी जब तक कोई उनकी तारीफ में खबरे लिखता या दिखाता है तब तक वह चैनल-अखबार,ब्लॉगर ओर पत्रकार अच्छा व ईमानदार होता है लेकिन जैसे ही वह उनकी खामियां, घपले, भ्रष्टाचार को उजागर करने का प्रयास करता है वह ब्लेकमेलर व भ्रष्टाचारी हो जाता है। सोशल मीडिया के वर्तमान दौर में जब पत्रकार व पत्रकारिता की परिभाषा ही बदल गई है ओर पारम्परिक मीडिया के समक्ष अस्तित्व का संकट महसूस हो रहा है तब पत्रकारों के लिए भी लेखनी की स्वतंत्रता कायम रखना कठिन से अधिक कठिन होता जा रहा है। मीडिया जगत में बढ़ती गलकाट प्रतिस्पर्धा के दौर में लेखनी व खबर प्रसारण के स्तर में गिरावट आई है ये मानने में कोई संकोच नहीं है। मीडिया जगत में गलत कार्य करने वाले कोई नहीं है या किसी भी स्तर पर पीत पत्रकारिता नहीं होती ऐसा कहना भी गलत होगा लेकिन इसकी आड लेकर सबको एक जैसा समझना उसी तरह है जैसे ये कह दिया जाए कि सारे अधिकारी व नेता गलत होते है। कहीं भी सब गलत और सब अच्छे नहीं है इसीलिए एक तराजु में सबको नहीं तोला जाना चाहिए। पत्रकारिता व पत्रकारों की स्वतंत्रता की बाते तो खूब होती है लेकिन कोई भी सरकार और स्वयं कई बड़े मीडिया प्रतिष्ठान भी नहीं चाहते कि पत्रकारों को वास्तविक स्वतंत्रता हासिल हो। स्वतंत्रता को लेकर हकीकत ये है कि पत्रकार पूरी दुनिया की खबरें छाप सकती है लेकिन अपनी पीड़ा को अपने ही बैनर में शब्द नहीं प्रदान कर सकते। स्वतंत्र प्रेस व पत्रकारिता की राह में मीडिया का बढ़ता व्यवसायीकरण भी चुनौती बन रहा है। मीडिया को मोटा राजस्व देने वाले निजी संस्थान या धनपति गलतियां भी करें तो करें एक संस्थान या व्यक्ति लिख उसकी गलतियों पर पर्दा डालने का प्रयास भी कई बार स्वतंत्रता की बात करने वाला इसी मीडिया का हिस्सा करता है। कोई पत्रकार सब चुनौतियां स्वीकार करते हुए सच्चाई उजागर करने पर अड़ा रहना चाहे तो उसकी राह में कितने कांटे बिछाए जाते है ये इस राह से गुजर चुके कई पत्रकार मित्र अच्छी तरह जानते और समझते है। प्रेस की वास्तविक स्वतंत्रता का सपना केवल प्रेस फ्रीडम दिवस मनाने से नहीं बल्कि तभी साकार होगा जब नेता हो या अफसर, उद्योगपति हो या समाजसेवी उनकी कमियों को उजागर करने वालों को अपना दुश्मन नहीं मित्र माने और उसे उसी तरह सम्मान प्रदान करे जो कभी कमियां गिनाने वाले देवर्षि नारद को इन्द्रदेव प्रदान करते आए। पत्रकार जनता की पीड़ा को अपनी कलम, माइक या कैमरे से उजागर करते है तो उस पर लीपापोती कर उजागर करने वालों को झूठा साबित करने की बजाय पीड़ा का समाधान कर राहत देने का प्रयास हो और उजागर करने वालों की हौंसला अफजाई हो तभी प्रेस स्वतंत्रता दिवस की बधाई देना सार्थक होगा। स्वतंत्र प्रेस एवं पत्रकारों का भी दायित्व है कि उसके लिए किसी निजी हित का पोषण करने की बजाय राष्ट्रहित सर्वोपरी हो और वह केवल निंदक बनने की बजाय पॉजिटिव रोल भी निभाए और समाज से लेकर सरकार तक जो अच्छा कार्य हो रहा उसे भी कमियों की तरह ही समभाव से उजागर व प्रकाशित करें। किसी का निंदक या प्रशंसक बनने की बजाय पत्रकारिता धर्म के प्रति संतुलित रवैया अपनाने पर ही एक पत्रकार सम्मान का वास्तविक हकदार हो सकता।
*स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक*
पूर्व चीफ रिपोर्टर, राजस्थान पत्रिका, भीलवाड़ा
मो. 9829537627


