रूस से तेल खरीद पर कांग्रेस की ‘यू-टर्न’ राजनीति: पहले खरीदने पर आपत्ति, अब न खरीदने पर ऐतराज!
- दोगलापन: रूस-यूक्रेन युद्ध के समय तेल खरीद को ‘आतंकवाद की फंडिंग’ बताने वाली कांग्रेस अब बदल रही सुर।
- ट्रम्प का बयान: डोनाल्ड ट्रम्प के दावों को आधार बनाकर केंद्र सरकार पर हमलावर हुए विपक्षी नेता।
- देशहित सर्वोपरि: मोदी सरकार ने ‘सस्ते तेल’ की कूटनीति से देश को पहुँचाया बड़ा आर्थिक फायदा।
नई दिल्ली। राजनीति में विरोध का कोई आधार होना चाहिए, लेकिन रूस से कच्चे तेल की खरीद के मुद्दे पर कांग्रेस जिस तरह का रुख अपना रही है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरत में डाल दिया है। कभी रूस से तेल खरीदने पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाली कांग्रेस, अब रूस से तेल कम खरीदने की खबरों पर मोदी सरकार को घेर रही है।
पहले क्या था कांग्रेस का स्टैंड?
जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ और अमेरिका ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। उस वक्त कांग्रेस के कई दिग्गजों ने इस पर नाराजगी जताई थी। तर्क दिया गया था कि भारत का पैसा रूस के युद्ध को वित्तपोषित (Fund) कर रहा है। कांग्रेसियों ने इसे ‘आतंकवाद को बढ़ावा’ देने जैसा करार दिया था।
अब अचानक क्यों बदले सुर?
हाल ही में अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कुछ बयानों के बाद कांग्रेस ने नया मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार ट्रम्प के दबाव में आकर रूस से नाता तोड़ रही है। सवाल यह उठता है कि जो तेल खरीद कल तक कांग्रेस की नजर में ‘गलत’ थी, आज उसी पर रोक की संभावना उन्हें ‘दबाव’ क्यों लग रही है?
भारत की सफल कूटनीति और आर्थिक लाभ
सच्चाई यह है कि भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा रूस से पूरा कर रहा था। जब दुनिया महंगाई से जूझ रही थी, तब रूस से मिले सस्ते तेल ने भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता दी और विकास कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि फैसले किसी बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि ‘इंडिया फर्स्ट’ की नीति के तहत लिए जाते हैं।
“किस देश से कैसा समझौता करना है, इसका निर्णय देश की निर्वाचित सरकार करती है। कांग्रेस का यह विरोधाभास दर्शाता है कि उनके पास विरोध का कोई ठोस मुद्दा नहीं है।”
कांग्रेस की यह दुविधा बताती है कि वह केवल विरोध के लिए विरोध की राजनीति कर रही है। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर पार्टी का बदला हुआ स्टैंड जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है।


