शाहपुरा में हिंदुओं की हुंकार: 108 कुण्डीय समरसता महायज्ञ में 1111 जोड़ों ने दी आहुति, उमड़ा जनसैलाब
सिर से पांव तक शरीर में समाहित हैं चारों वर्ण’—शक्करगढ़ महाराज ने शाहपुरा हिंदू सम्मेलन में जगाई समरसता की अलख
✍️ *मोनू सुरेश छीपा।द वॉयस ऑफ राजस्थान 9667171141*
शाहपुरा (राजस्थान)। रामस्नेही बालाजी मुखर्जी बस्ती के तत्वावधान में आयोजित ‘विराट हिंदू सम्मेलन और समरसता यज्ञ’ में आस्था और एकता का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। आयोजन की शुरुआत 108 कुण्डीय समरसता महायज्ञ से हुई, जिसमें समाज के सभी वर्गों के 1111 जोड़ों ने एक साथ आहुति देकर जातिवाद की दीवारों को तोड़ सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
अखाड़ा प्रदर्शन और भव्य धर्मसभा
महायज्ञ के बाद बालाजी मंडल फूलियाकलां के युवाओं ने हैरतअंगेज अखाड़ा प्रदर्शन कर शौर्य का प्रदर्शन किया। इसके पश्चात आयोजित धर्मसभा में मुख्य वक्ता के रूप में आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक और अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य माननीय सुरेश जी भाईसाब उपस्थित रहे।
मुख्य वक्ता का आह्वान: ‘बदलती डेमोग्राफी से रहें सावधान’
आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश जी ने अपने संबोधन में हिंदू समाज को संगठित करने के संघ के संकल्प को दोहराया। उन्होंने कहा:
”हिंदू समाज को विघटनकारी शक्तियों से सावधान रहने की आवश्यकता है। बदलती डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) एक गंभीर चिंता का विषय है, और इससे निपटने के लिए सकल हिंदू समाज को एकजुट होकर सक्रिय होना होगा।”
संतों का पाथेय: संस्कारों से ही बचेगा समाज
हनुमंत धाम शक्करगढ़ के महामंडलेश्वर जगदीश पुरी जी महाराज ने वर्ण व्यवस्था की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए कहा कि चारों वर्ण हमारे शरीर के अंगों की तरह हैं, जो सामंजस्य से जीवन चलाते हैं। उन्होंने आधुनिक शिक्षा के साथ कम होते संस्कारों और टूटते दांपत्य जीवन पर गहरी चिंता व्यक्त की।
मातृशक्ति और कुटुंब प्रबोधन
मातृशक्ति का प्रतिनिधित्व कर रही प्राचार्य रीता देवी ने वैदिक काल की नारियों के गौरव का स्मरण कराते हुए ‘कुटुंब प्रबोधन’ पर बल दिया। उन्होंने कहा कि परिवारों में सामंजस्य बनाए रखना और अगली पीढ़ी को संस्कारित करना महिलाओं की मुख्य भूमिका है।
संघ की 100 साल की यात्रा और पंच परिवर्तन
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. पुष्करराज मीणा ने बताया कि संघ की 100 वर्ष की यात्रा के उपलक्ष्य में देशभर में 80,000 हिंदू सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने सनातन संस्कृति को विश्व की सबसे प्राचीन जीवन पद्धति बताया।
कार्यक्रम के अंत में अनंत चौबे ने सभी आगंतुकों, मातृशक्ति और कार्यकर्ताओं का आभार प्रकट किया।



