🎯 टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा: कब तक हाशिए पर रहेगा विकास का वादा?
✍️ *मोनू सुरेश छीपा।द वॉयस ऑफ राजस्थान 9667171141*

भीलवाड़ा, जिसे गर्व से ‘राजस्थान की टेक्सटाइल सिटी’ कहा जाता है, आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह विरोधाभास चिंताजनक है: जहाँ एक ओर यह ज़िला देश के कपड़ा उद्योग का केंद्र है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग टूटी सड़कों, अनियमित जलापूर्ति और घटते रोज़गार के अवसरों जैसी मूलभूत चुनौतियों से जूझ रहे हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सामूहिक जवाबदेही की कमी को दर्शाती है।
1. आधारभूत संरचना: घोषणाओं का बोझ और ज़मीनी हकीकत
वर्षों से, भीलवाड़ा के विकास की कहानी केवल बजट घोषणाओं तक सीमित रही है।
जल संकट: पानी, जो किसी भी औद्योगिक या कृषि प्रधान क्षेत्र की जीवनरेखा है, भीलवाड़ा में एक वार्षिक चुनावी मुद्दा बन चुका है। मेजा डैम और शहरी पेयजल योजनाओं के बावजूद, टैंकर संस्कृति खत्म नहीं हो पाई है। हमें स्थायी जल प्रबंधन योजना चाहिए, न कि चुनावी आश्वासन।
सड़कें और कनेक्टिविटी: शहर और ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों की खराब गुणवत्ता न केवल आमजन को परेशान करती है, बल्कि टेक्सटाइल उद्योग की लॉजिस्टिक्स लागत को भी बढ़ाती है। हमें गुणवत्तापूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, जो विकास की गति को तेज कर सके।
2. अर्थव्यवस्था का आधार: टेक्सटाइल और कृषि
भीलवाड़ा की अर्थव्यवस्था दो स्तंभों पर टिकी है: कपड़ा उद्योग और कृषि। दोनों को नीतिगत समर्थन की सख़्त ज़रूरत है।
टेक्सटाइल उद्योग का संघर्ष: यह उद्योग बिजली की दरों, पानी की उपलब्धता और श्रम नीतियों की अनिश्चितता से त्रस्त है। उद्योगपतियों को सम्मान देना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है उन्हें स्थिर और प्रतिस्पर्धी व्यापारिक माहौल प्रदान करना, ताकि रोज़गार के नए अवसर पैदा हों और युवाओं का पलायन रुक सके।
किसान और मास्टर प्लान: विकास के नाम पर अक्सर कृषि भूमि और किसानों के हितों की अनदेखी होती है। यह ज़रूरी है कि किसी भी बड़े मास्टर प्लान या औद्योगिक विस्तार में किसान की सहमति और सहभागिता केंद्र में हो।
3. नेतृत्व और जवाबदेही: अब बदलाव ज़रूरी
भीलवाड़ा को अब ‘मैनेजमेंट’ करने वाले नहीं, बल्कि ‘कमिटमेंट’ करने वाले नेतृत्व की आवश्यकता है।


