*ये कैसी व्यवस्था हमारी,अब बहस इस बात पर हादसों में मरने वालों में कम दुर्भाग्यशाली कौन*
*मरने वाले सभी भारतीय पर जिंदगी की कीमत अलग-अलग आंकी जा रही*
*निलेश कांठेड़*
आकस्मिक मौत दुर्घटना से हो या आतंकवादी हमले में हो या भगदड़ में कुचल जाने से हो या फिर बिल्डिंग/पुलिया गिर जाने से हो, हर दृष्टि से दुर्भाग्यशाली ही होती है ओर जो उनके शिकार होते है उनको परिजनों को बिछोह का दुःख समान रूप से भोगना पड़ता है। किसी भी हादसे में अपने प्रियजनों को खो देने वाले प्रियजनों के दुःख के स्तर में कोई अंतर नहीं होता है ओर मरने वाले भी कानून की दृष्टि में एक समान माने गए भारतीय नागरिक होते है। इसके बावजूद *हमारी सरकारी व्यवस्था मरने वालों में भी भेदभाव कर जाती है। कहीं मरने वालों के परिजन एक करोड़ रूपए तक मुआवजा पा जाते है तो कहीं मरने वालों के घर वालो को एक-दो लाख रूपए में ही संतोष करना पड़ता है।* इसके पीछे सरकारी तर्क ओर नियम कुछ भी हो पर व्यवहारिक धरातल पर तो यहीं कहां जाएगा कि भारत में मरने वालों के साथ भी मुआवजा ये देख कर तय होता है कि मरने वाला कौन है ओर उसका स्टेट्स क्या है। *पिछले कुछ दिनों में भारत में हुए कुछ बड़े हादसों के बाद दिए जाने वाले मुआवजे की राशि में भारी अंतर इस बहस को जन्म दे रहा है।* पिछले माह अहमदाबाद में हुए विमान हादसे की बात करें तो इसका शिकार होने वालों के परिजनों को एक-एक करोड़ रूपए का मुआवजा विमान कंपनी द्वारा दिया गया तो हाल ही राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में स्कूल की छत गिरने से अनमोल जिंदगी गंवा देने वाले सात मासूम बच्चों के परिजनों को 10-10 लाख रूपए देने की घोषणा की गई। इसके बाद 27 जुलाई को उत्तराखण्ड के हरिद्धार के मनसादेवी मंदिर मार्ग पर भगदड़ में जान गंवा देने वाले लोगों के परिजनों को मुआवजे के नाम पर राज्य सरकार द्वारा मात्र दो-दो लाख रूपए देने की घोषणा की गई। पहलगाम में आतंकी हमले का शिकार होने वाले नागरिकों के परिजनों को जम्मू कश्मीर सरकार ने 10-10 लाख रूपए मुआवजा दिया इसके अलावा वह जिस राज्य के निवासी थे वहां की सरकारों ने भी दस से पचास लाख रूपए तक अलग-अलग मुआवजा भी दिया। मई में बेंगलूरू में आरसीबी के आईपीएल चैम्पियन बनने के बाद सम्मान समारोह में स्टेडियम के बाहर मची भगदड़ में मरने वालों के परिजनों को कर्नाटक सरकार ने 25-25 लाख रूपए तो आरसीबी ने अलग से 10-10 लाख रूपए का मुआवजा देने की घोषणा की। ये कुछ उदाहरण इस बात की पुष्टि करते है कि *मरने वाले भले सभी भारतीय हो पर उनकी जिंदगी की कीमत अलग-अलग आंकी गई है। आप हवाई जहाज में बैठकर मौत के शिकार होंगे तो परिवार वाले मुआवजे में करोड़ो पा जाएंगे पर कहीं मंदिर के बाहर दर्शनों की भगदड़ या रूटीन बस हादसों का शिकार हो गए तो घर वालों को दो-पांच लाख रूपए ही मुआवजा मिल पाएगा।* मुआवजे में इस प्रकार की विसंगति के भले कुछ भी नियम ओर कारण हो लेकिन लोककल्याणकारी कहलाने वाली *हमारी सरकारों का कर्तव्य बनता है कि नागरिकों की जिंदगी की कीमत एक समान लगाए ओर उसमें कोई भेदभाव नहीं हो।* मरने वाले सभी दुर्भाग्यशाली होते है इसलिए सरकारे अपनी व्यवस्था से *ऐसी नौबत नहीं बनाए कि मरने वालों में भी कौन अधिक ओर कौन कम दुर्भाग्यशाली ये बात आ जाए।* सरकारों को यह भी तय करना होगा कि मुआवजे की अधिक राशि की जरूरत हवाई जहाज में बैठने वालों के परिजनों है या सड़क/रेल हादसे ओर भगदड़ में जिंदगी गंवा देने वाले आम आदमी के परिवारजन को है। वर्तमान हालात में तो देश के नागरिक यह सोचने को विवश है कि काश किसी हादसे में ही मृत्यु आए तो हवाई जहाज में बैठकर हो ताकि पीछे परिवारजनों के लिए मुआवजे की पर्याप्त व्यवस्था हो। ऐसी सोच से बचने के लिए *केन्द्र ओर राज्य सरकार को मुआवजे की एक समान नीति नियम तय करने होंगे ताकि नागरिकों की हादसों में मृत्यु पर कीमत अलग-अलग नहीं लगाई जाए।* ऐसा नहीं हो कि एक राज्य मरने वालों को दस-बीस लाख दे रहा ओर उसी तरह की मौत किसी अन्य राज्य में होने पर दो-पांच लाख रूपए ही मिल रहे है। ऐसा नहीं हो कि कहीं मरने वाले के परिजन को केन्द्र ओर राज्य सरकार दोनों मुआवजा दे रही ओर कहीं मृत्य के परिजन एक सरकार से भी पर्याप्त मुआवजा पाने के लिए तरस जाए।
*स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक,भीलवाड़ा*
मो.9829537627


