*दोषियों पर नहीं आती कोई आंच तो फिर किस मतलब की सरकारों की जांच*
*नई जांच से पहले पुरानी जांच रिपोर्टो के बाद जिम्मेदारों पर हुए एक्शन का हिसाब मांगे*
*टिप्पणी-निलेश कांठेड़*
✍️ मोनू एस.छीपा । द वॉयस ऑफ राजस्थान 9667171141*
सफर के लिए न सड़क सुरक्षित है न आसमान सुरक्षित है, अस्पतालों में रोगियों व उनके तिमारदारों की ओर स्कूलों में बच्चों की जिंदगी खतरे में है। आखिर हम अपनी जिंदगी की सुरक्षा के लिए किस पर भरोसे करे। कभी सड़क हादसों में तो कभी रेल ओर हवाई हादसों में मौत दर मौत होती जाती है। कोई गेंगस्टरों की गोलियों का शिकार होता है तो कोई सरकारी खामियों के कारण अनमोल जिंदगी से हाथ धो बैठता है। *असमय ही इस दुनिया से विदा करने के लिए अलग-अलग रूपों में मौत का खेल बदस्तूर जारी है पर सरकारी व्यवस्था लाचार नजर आती है।* सरकारे ऐसी घटनाएं होते ही सहानभूति के नाम पर शोक संदेश जारी करती है ओर मुआवजे बांट देती है। दोषियों को नहीं बक्शने के रटे रटाए ऐलान जोर शोर से करने के साथ आमजन ओर पीड़ितों के परिवारों में भड़कने वाली गुस्से की आग को शीतल करने के लिए जांच बिठा दी जाती है। *जांच पर जांच उसके बावजूद दोषियों पर नहीं आती कोई आंच तो फिर किस मतलब की ऐसी सरकारी जांच। ये कोई राजनीतिक जुमला नहीं बल्कि उस सरकारी व्यवस्था का अंग है जिसकी जांच रिपोर्ट देख कई बार लगता है हादसों के लिए सरकारी सिस्टम नहीं बल्कि उपरवाला ही जिम्मेदार है ओर ये तो निमित मात्र है।* कानून व्यवस्था में विश्वास रखने वाला होने से आमजन हर भयानक हादसे के बाद ये सोच कर शांत हो जाता है अब जांच हो रही है तो दोषी नहीं बचेंगे ओर व्यवस्था सुधर जाएगी। कोई मामला ज्यादा तुल पकड़ता है तो सरकारों द्वारा दो-चार को एपीओ या निलम्बित कर कागजी सख्ती दिखा दी जाती है। *इस सख्ती के कागजी ढोल की पोल उस समय खुल जाती है जब कुछ माह बाद ही निलम्बित होने वाले ऐसे दोषी उसी पद पर या उससे भी अधिक पावरफुल पोस्ट पर आकर ये संदेश देते प्रतीत होते है कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।* वास्तव में देखे तो दोष किसी व्यक्ति विशेष से अधिक उस सरकारी व्यवस्था का है जिसमें इंसानी जिंदगी की कीमत कुछ नोटो में आंक ली जाती है। इसी कारण खामियों में स्थाई सुधार नहीं होता ओर कुछ समय बाद पहले से भी भीषण हादसा सामने आ जाता है। *कमी हमारी उस सोच की भी है जिसमें कोई नई घटना होते ही पुरानी घटना को भूला दिया जाता है ओर सरकारे दबाव मुक्त हो जाती है।* जब तक एक मुद्दे के पीछे पड़े रहने की आदत नहीं बनेगी सरकारे इसी तरह जांच ओर मुआवजे का मामूली मरहम लगाती रहेगी ओर ध्यान भटकने से जख्म कब नासूर बन गया इसका अहसास भी नहीं होगा। *किसी भी हादसे पर नई जांच की मांग करने से पहले उसी तरह के हादसों में पहले हुई जांचों की रिपोर्ट कहां दफन हो चुकी ये भी जानना जरूरी है।* चुनावों के माध्यम से सरकारों में चेहरे भले बदल जाते है पर अधिकतर नेताओं व अफसरों की वह सोच नहीं बदलती जिसमें कितने भी भीषण हादसे हो जाए *‘‘अपने आदमियों’’ को दोषमुक्त कराने के लिए साम,दाम,दण्ड, भेद सबको जायज माना जाता है।* हाल ही कई घरों में खुशियों के चिराग बुझा देने वाले जैसलमेर बस हादसे ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष देखने वालों का दिल भले दहला दिया हो पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले राजनेताओं ओर लालफीताशाही में भरोसा करने वाले अफसरों के पत्थरदिल पिघले होंगे इसका भरोसा किसी को नहीं है। अभी जनाक्रोश दिख रहा है तो कार्रवाई का चाबूक चलता दिख रहा है पर सब जानते है कि जैसे ही कुछ दिन होंगे फिर हालात वहीं नजर आने वाले है। सरकारी तंत्र यदि वास्तव में आमजन की जिंदगी को अनमोल मानता है तो अब जांच नहीं कार्रवाई चाहिए। *कार्रवाई ऐसी हो जो दोषियों में ही नहीं उनको पनपाने ओर संरक्षण देने वालों के मन में भी भय उत्पन्न करे ओर कानून को अंगूठा दिखाने का साहस कोई नहीं कर सके।* हमे जांच के नाम पर कागजी रिपोर्ट नहीें बल्कि वो एक्शन चाहिए जो दोषियों को सींखचो के पीछे पहुंचाएं और जिम्मेदार अफसरों ओर नेताओं का भी नाम सार्वजनिक करे। ऐसा संभव नहीं हो सकता कि किसी भी हादसें में दोषी केवल छोटे-मोटे पद वाले ही हो ओर बड़े आदमी की कोई गलती ही नहीं हो। *जिस दिन ऐसे हादसों के लिए उंचे पदों पर बैठने वालों या रसूखदारों को दोषी मान सख्त सजाएं मिलने लगेगी उसी दिन व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जगेगी अन्यथा तो इन हादसों में जिंदगिया यू ही खत्म होती रहेगी* ओर हम कुछ दिन आंसू बहा फिर किसी नए हादसे का इन्तजार होने तक ऑल इज वैल मान रील बना उसे शेयर ही करते रहे जाएंगे।
*स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक*
भीलवाड़ा, मो.9829537627


