राजा जनमेजय का नाग यज्ञ: क्या जहाजपुर (यज्ञपुर) में हुआ था सर्पसत्र? जानिए पौराणिक मान्यता और ऐतिहासिक तथ्य
महाभारत कालीन कथा, नागदी नदी और यज्ञपुर नामकरण से जुड़ी मान्यताओं का विश्लेषण
मोनू सुरेश छीपा
भीलवाड़ा। भारतीय पौराणिक परंपरा में का विशेष महत्व है। इसी महाकाव्य के आदिपर्व में वर्णित कथा के अनुसार ने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए ‘सर्पसत्र यज्ञ’ अर्थात नाग यज्ञ कराया था।
नाग यज्ञ का कारण क्या था?
पौराणिक कथानुसार, राजा परीक्षित को नाग ने ऋषि शृंगी के शाप के फलस्वरूप डस लिया था। इससे क्रोधित होकर जनमेजय ने समस्त नागों के विनाश हेतु महायज्ञ आरंभ किया। मंत्रों की शक्ति से नाग अग्नि में खिंचकर आने लगे।
हालांकि, यज्ञ के दौरान ऋषिपुत्र ने हस्तक्षेप किया और धर्म व करुणा का उपदेश देते हुए यज्ञ को रुकवाया, जिससे तक्षक नाग की प्राणरक्षा हुई।
जहाजपुर (यज्ञपुर) से जुड़ी स्थानीय मान्यता
राजस्थान के (जिला ) को लेकर स्थानीय परंपराओं में यह मान्यता प्रचलित है कि यही वह स्थल है जहां जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था।
लोककथाओं के अनुसार:
- यज्ञ की अग्नि में नागों के भस्म होने से “नागदी नदी” का उद्भव हुआ।
- यज्ञ उपरांत इस स्थान का नाम ‘यज्ञपुर’ या ‘यज्ञनगर’ रखा गया।
- क्षेत्र में प्राचीन यज्ञकुंड के अवशेष होने का दावा भी किया जाता है।
ऐतिहासिक और शोध दृष्टिकोण
इतिहासकारों के अनुसार नाग यज्ञ की कथा पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है, किंतु जहाजपुर को यज्ञस्थली मानने के प्रत्यक्ष पुरातात्त्विक प्रमाण सार्वभौमिक रूप से स्थापित नहीं हैं। यह आस्था, परंपरा और स्थानीय जनश्रुतियों पर आधारित मान्यता है।
धार्मिक आस्था और जनविश्वास
लोकविश्वास है कि राजा जनमेजय के नाम का स्मरण करने से सर्प भयभीत होते हैं। हालांकि, यह धारणा धार्मिक आस्था का विषय है, वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
(नोट: यह लेख पौराणिक ग्रंथों एवं स्थानीय जनमान्यताओं पर आधारित है। पाठकों से अपेक्षा है कि इसे धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में समझें।)


