*ये जिंदगी नहीं मिलेगी दुबारा,इसलिए जितनी ‘‘चादर‘‘ उतने ही पैर फैलाना* *ऋण के चक्रव्यूह में फंसकर मध्यमवर्ग लगा रहा जिंदगी दाव पर*

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*ये जिंदगी नहीं मिलेगी दुबारा,इसलिए जितनी ‘‘चादर‘‘ उतने ही पैर फैलाना*

*ऋण के चक्रव्यूह में फंसकर मध्यमवर्ग लगा रहा जिंदगी दाव पर*

*निलेश कांठेड़*

सुबह अखबार में पंचकुला के पास कार में एक ही परिवार के सात सदस्यों द्वारा सामूहिक आत्महत्या कर लेने की खबर ने मन को बहुत विचलित कर दिया। खबर में लिखा था कि सामूहिक आत्महत्या के पीछे कारण परिवार पर अत्याधिक ऋण व कर्जभार होना था। इस घटनाक्रम ने ये सोचने को विवश कर दिया कि अपनी आर्थिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के नाम पर हम किस कदर ऋण के जाल में उलझते जा रहे है। कई बार ऋण का चक्रव्यूह ऐसा हो जाता है कि उसमें फंसने के बाद व्यक्ति या परिवार को आत्महत्या का विकल्प ही नजर आता है ओर वह मौत को गले लगा लेते है। सामूहिक आत्महत्या की ये कोई पहली घटना नहीं है ऐसी कई घटनाएं पहले भी मीडिया की सुर्खियां बनी है। घटना सामने आने पर कुछ दिन चर्चा होती है ओर फिर भूलकर आगे बढ़ जाते है। आत्महत्या को हमारे धर्मशास्त्रों में कायरता कहा गया है यह कृत्य बताता है कि जिंदगी में कठिन हालात बनने पर उनका सामना कर मंजर बदल देने का जज्बा रखने की बजाय कई बार व्यक्ति को मौत को गले लगाना ज्यादा बेहतर महसूस होता है। ऋण का चक्रव्यूह ऐसा बुना जाता है कि कई बार आत्महत्या करने जा रहा व्यक्ति पीछे परिवार की सुरक्षा के प्रति निश्चिंत नहीं होने से पूरे परिवार सहित ही आत्महत्या कर लेता है। ऐसे भी दर्दनाक हालात सामने आए कि कर्जजाल में त्रस्त व्यक्ति परिवार के सदस्यों की हत्या कर स्वयं मौत को गले लगा लेता है। अब यहां चर्चा इस बात की होनी चाहिए कि व्यक्ति कर्ज के जाल में कैसे फंस जाता है ओर क्यों चाहकर भी उससे बाहर नहीं निकल पाता है। हमारे पूर्वजों ने भी नसीहत दी ओर कहावत भी है कि जितनी ‘चादर’ हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए यानि व्यक्ति को किसी से होड़ करने की बजाय अपनी क्षमता के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। ऋण अत्याधिक आवश्यकता होने पर ही लेना चाहिए ओर वह भी उतनी मात्रा में लिया जाए जिसे चुकाने की हम क्षमता रखते हो। कई बार जीरो प्रतिशत ब्याज जैसे लुभावने ऑफर के आकर्षण में फंसकर या रातोरात “लक्ष्मीपति” बनने की चाह में व्यक्ति चुकाने की क्षमता से अधिक ऋण ले बैठता है ओर बाद में ब्याज का ऐसा शिकंजा उस पर कस जाता है कि उसें मौत के सिवाए बचने का कोई विकल्प ही नजर नहीं आता है। शादियों में वैभव प्रदर्शन व घूमने फिरने के नाम पर भी आजकल लाखों रूपए का ऋण लेने में लोग संकोच नहीं करते ओर बाद में चुका नहीं पाने पर मरने या मारने की नौबत आ जाती है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि ऋण लेकर घी पीने की सोच कई बार आत्महत्या के हालात निर्मित कर देती है। परिवार का निर्माण करना अत्याधिक कठिन पर सामूहिक आत्महत्या कर उसे समाप्त करना आसान हो रहा है। यहां ये सीख जीवन में अंगीकार करनी होगी कि हमे अनावश्यक खर्चो के लिए ऋण लेने से बचना होगा ओर कैसे भी कठिन हालात क्यों ने आए आत्महत्या का विचार मन से निकालना होगा क्योंकि हमेशा यह याद रखना होगा कि ये जिंदगी दुबारा नहीं मिलेगी। जीवन रहेगा तो हम कठिन मेहनत ओर सद्कर्म कर मुश्किल पलों से निकल कर सुख की दुनिया में भी फिर जा सकते है। यह भी नहीं भूलना है कि सुख दुःख जीवन का चक्र है कभी सुख तो कभी दुःख आएगा। सुख के पल में याद रखे कि दुःख भी आ सकता इसलिए कभी घमंड ओर अभिमान नहीं करे ओर दुःख के पल में यहीं सोचे कि जैसे सुख हमेशा नहीं रहा वैसे ही दुःख भी हमेशा नहीं रहेगा ओर फिर सुख के पल आएंगे। सुख के पलों में सेवा व सहायता का जज्बा रखेगे ओर बचत को अपना साथी बनाएंगे तो शायद जिंदगी में दुःख के पल आएंगे ही नहीं ओर आ भी गए तो सहजता से गुजर जाएंगे। मुश्किल पलों में हिम्मत हारना नहीं लड़ना सीखे ओर जिंदगी अनमोल है इसलिए कुछ ऐसा कार्य कर जाए कि दुनिया से जाने के बाद भी लोग हमे याद रख पाए।

*स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक*
पूर्व चीफ रिपोर्टर,राजस्थान पत्रिका, भीलवाड़ा
मो.9829537627

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