*एसआई भर्ती रद्द करने पर ही बचेगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता अन्यथा अंगुलिया तो भाजपा सरकार पर भी उठेगी*
*पेपर खरीदने ओर बेचने वालों को संरक्षण देने वाले ‘आकाओ’ के चेहरे भी हो बेनकाब*
*निलेश कांठेड़*
भारत में राजनीति ओर नेताओं की विश्वसनीयता तो पहले ही ‘पाताल’ में पहुंच चुकी है ओर अब राजस्थान की भाजपा सरकार पता नहीं किस दबाव में उस सब इंसपेक्टर (एसआई) भर्ती परीक्षा को रद्द करने से कतरा रही है जिसमें चयन की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। भाजपा ने स्वयं डेढ़-दो वर्ष पूर्व विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान जोरशोर से दावा किया था कि आप हमे सरकार बनाने का मौका दे हम आरपीएससी पर भरोसा कायम रखने के लिए पूरी परीक्षा ही वापस कराएंगे। मतदाताओं ने उस वादे पर भरोसा करते हुए सरकार की चाबी तो भाजपा को थमा दी लेकिन अब उच्च न्यायालय में इस मामले की याचिका सुनवाई के दौरान सरकार के रंग-ढंग देख उसे कहना पड़ रहा है कि सारे राजनीतिक दलों के नेता एक जैसे होते है और ये कब पलटी मार जाए इसका कोई भरोसा नहीं। भाजपा ने आरपीएससी द्वारा ली गई इस परीक्षा में भ्रष्टाचार की पराकाष्टा होकर पेपर लीक होने ओर ईमानदारी से प्रत्याशी चयन नहीं होने का आरोप लगाते हुए राजस्थान की तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार को जमकर घेरते हुए बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया था। सरकार बदलने पर परीक्षाओं में चयन पूरी पारदर्शिता रखी जाएगी इसी उम्मीद में सरकारी नौकरी पाने की आस लगाए युवाओं ने भाजपा को खूब समर्थन दिया। सरकार बनी तो शुरू में सरकार के तेवर देख लगा कि विश्वास खो चुकी इस परीक्षा को सरकार पूरी तरह रद्द कर दुबारा कराएगी। जांच एजेसिंयों ने भी रिपोर्ट में साफ किया था कि इस परीक्षा में पेपर लीक होकर चयन में इतना भ्रष्टाचार व घालमेल हुआ है कि यह तय करा पाना बहुत कठिन है कि किसका चयन ईमानदारी से हुआ है किसका बईमानी से। जब ऐसी स्थिति हो तो हर कोई यहीं कहेगा कि परीक्षा दुबारा होनी चाहिए पर अब सरकार कोर्ट में कह रही कि अभी तो चयन में कुछ ही फर्जीवाड़ा मिला है सबको बईमान नहीं मान सकते इसलिए फिलहाल भर्ती पूरी तरह रद्द नहीं कर सकते। सरकार का यह तर्क उन चयनित अभ्यर्थियों के अधिवक्ताओं के समान है जिन पर अभी तक चयन में गलत रास्ता अपनाने का आरोप नहीं लगा है या पुष्टि नहीं हो पाई है। हॉलाकि सरकार के मना करने के बावजूद वंचित रह गए हजारों-लाखों अभ्यर्थी उम्मीद लगाए हुए है कि उच्च न्यायालय शायद सरकार के तर्को से सहमत नहीं होकर दुबारा परीक्षा कराने के आदेश दे सकता है। नैतिक आधार पर सामान्यत ये माना जाता है कि जब किसी परीक्षा में यह तय कर पाना मुश्किल हो कि किसका चयन ईमानदारी से ओर किसका गलत रास्ते से हुआ है तो उसे निरस्त ही करना चाहिए। चयनित कुछ सैकड़ो अभ्यर्थियों को दुबारा परीक्षा नहीं देनी पड़े इसके लिए उन हजारों अभ्यर्थियों के साथ ‘अन्याय’ नहीं किया जाना चाहिए जिनको ये लग रहा है कि परीक्षा में पेपर लीक व घूसखोरी जैसे कारनाम होने से वह कड़ी मेहनत करने के बावजूद चयन से वंचित रह गए। जिनका चयन कड़ी मेहनत के बुते पर हुआ है तो उन्हें दुबारा परीक्षा में बैठने से कतराना नहीं चाहिए क्योंकि उनमें योग्यता होंगी तो वह फिर से चुन लिए जाएंगे हॉलाकि यह संभव है ईमानदारी से चयनित कुछ शायद दुबारा परीक्षा होने पर चयन नहीं हो पाए पर परीक्षा की विश्वसनीयता बचानी है तो ये जोखिम उठाना ही पड़ेगा ओर सभी को इसमें साथ देना ही चाहिए। एसआई भर्ती परीक्षा में जिस तरह हर चयनित अभ्यर्थी शक के दायरे में आ गया है उसके बाद यदि दुबारा परीक्षा नहीं होती है तो उंगली उन पर भी उठना तय है जिनका चयन कड़ी मेहनत से हुआ होगा। ऐसे में वह भले मेहनत करके चयनित हुए हो चर्चा यहीं होगी कि इसने भी शायद कहीं से पेपर का जुगाड़ कर लिया हो गया डमी अभ्यर्थी बिठा परीक्षा देने या आरपीएससी मेंबरों तक कोई सेटिंग बिठा ली होगी। युवाओं के मन में आरपीएससी जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता बचानी है ओर पेपर माफिया को नेस्तानाबूद करने के दावों में दम भरना है तो सरकार को सभी राजनीतिक व वोटों की गणित के दबावों से उपर उठ सख्त फैसले लेने का हौंसला दिखाना ही पड़ेगा। वर्तमान माहौल में ये धारण बलवती होती जा रही है कि बिना प्रश्नपत्र का जुगाड़ किए या डमी परीक्षार्थी बिठाए बिना सरकारी नौकरी में चयन आसमान से तारे तोड़ने के समान है। इस धारण के चलते सबसे अधिक खामियाजा उन प्रतिभावान परीक्षार्थियों को भुगतना पड़ रहा है जो कड़ी मेहनत के बल पर चयनित होते है। पेपर माफिया के नाम पर केवल कोचिंग सेंटर चलाने वालों ओर सरकारी नौकरियां कर रहे कर्मचारियों की धरपकड़ से युवाओं के भविष्य के लिए नासूर बन चुकी इस महामारी का अंत नहीं होगा। यदि पेपर लीक जैसे घातक वायरस से परीक्षाओं को बचाना है तो राजस्थान सरकार के साथ उसे चलाने वाली पार्टी को भी मजबूत फैसले लेने होंगे। ये बात साधारण व्यक्ति के गले कदापि नहीं उतरने वाली है कि फरार चल रहे कुछ पेपर माफिया को पकड़ लेने से सारे दोषी कानून के शिंकजे में हो जाएंगे ओर भर्ती प्रणाली पाक साफ ओर पारदर्शी हो जाएगी। सब ये बात जानते ओर मानते है कि प्रतिभाओं के भविष्य को बर्बाद करने वाले ऐसे नकल माफिया गिरोह ‘आका’ बने बड़े राजनेताओं ओर अधिकारियों के संरक्षण के बिना कदापि पनप नहीं सकते। अब राजस्थान सरकार हो या केन्द्र सरकार चुनौती ऐसे गिरोह को नोटो ओर वोटो के मोह में प्रश्रय दे रहे आकाओ के गले तक हाथ पहुंचाने की है। जब तक इन गिरोह को पनपाने वाले नेताओं ओर अफसरों के चेहरों से नकाब नहीं उतरेगा व्यवस्था सुधरने का यकीन कोई नहीं कर पाएंगा। राजस्थान की भजनलाल सरकार के पास मौका है कि भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक कराने वाले, डमी कैडिंडेट बिठाने वाले ओर पैसे ओर सिफारिश के बल पर योग्य की अनदेखी कर अयोग्य का चयन करने वाले बड़े चेहरों को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के बेनकाब कर जनता का विश्वास फिर भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता के लिए अर्जित कर सके। यदि सरकार किसी भी कारण से इन चेहरो को बेनकाब करने की बजाय बचाने का प्रयास करेेगी तो यकीन मानिए तीन वर्ष बाद वह भी उसी तरह कटघरे में खड़ी होगी जिस तरह अभी कांग्रेस की पिछली गहलोत सरकार आ चुकी है। यदि चौर-चौरे मौसरे भाई वाली धारण राजनीति में पनपने से रोकनी है तो भाजपा सरकार को उन नेताओं के चेहरों से ईमानदारी ओर जनसेवा का मुखोटा उतार के फेंकना होगा जो भर्ती परीक्षा गिरोह के आश्रयदाता बन प्रतिभाओं का गला घोंटने का संगीन अपराध कर चुके है।
*स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक* भीलवाड़ा
मो.9829537627


