शाही ठाठ-बाट और राजसी लवाजमा: जानें क्यों शाहपुरा में बिना ईशर के निकलती है गणगौर माता की सवारी?
✍️ *मोनू सुरेश छीपा।द वॉयस ऑफ राजस्थान 9667171141*
शाहपुरा (राजस्थान)। भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा नगर में गणगौर महोत्सव के अवसर पर रियासतकालीन परंपराओं की अनुपम छटा देखने को मिली। महलों के चौक से गणगौर माता की शाही सवारी पूरी भव्यता और राजसी लवाजमे के साथ रवाना हुई, जिसे देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। सजे-धजे घोड़े, ऊंट, बैंड-बाजे और पारंपरिक वेशभूषा में शामिल दल ने आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।
शाहपुरा की अनूठी परंपरा: बिना ईशर के गणगौर
शाहपुरा की गणगौर सवारी की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी सदियों पुरानी परंपरा है। यहाँ ईशर जी की प्रतिमा शामिल नहीं होती; केवल माता पार्वती (गणगौर) की प्रतिमा ही पूरे नगर में भ्रमण करती है। रियासतकाल से चली आ रही इस अनूठी परंपरा को आज भी नगरवासी पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।
शाही मार्ग पर पुष्प वर्षा और भक्ति का माहौल
यह शाही सवारी अपने निर्धारित मार्ग महलों के चौक से शुरू होकर सदर बाजार और कुंड गेट पहुंची। सवारी का समापन नरसिंह द्वार पर विधि-विधान से महाआरती के साथ हुआ। पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं और शहरवासियों ने जगह-जगह पुष्प वर्षा कर माता का आत्मीय स्वागत किया, जिससे समूचा वातावरण भक्तिमय हो गया।
लोक संस्कृति और लोक नृत्यों का संगम
इस वर्ष गणगौर सवारी में सांस्कृतिक रंगों की विशेष धूम रही। आयोजन में कच्छी घोड़ी, चरी नृत्य, और कठपुतली नृत्य के साथ-साथ कालका माता एवं नृसिंह भगवान की आकर्षक झांकियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। बाहरी राज्यों से आए कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों ने महोत्सव की रौनक में चार चांद लगा दिए।
सुहागिनों ने की अखंड सौभाग्य की कामना
गणगौर पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए आस्था का केंद्र रहा। सुहागिनों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता की पूजा-अर्चना की और अपने परिवार की सुख-समृद्धि व अखंड सौभाग्य की कामना की। शाहपुरा की इस सवारी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि यहाँ की सांस्कृतिक विरासत आज भी जन-जन के हृदय में जीवंत है।


