*फिर क्यों करेगा कोई देहदान जब मेडिकल कॉलेज ही बोलेंगे हमारे पास व्यवस्था नहीं* *देहदान करने वाले तैयार पर सरकारी सिस्टम को लेने में आ रहा जोर*

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*फिर क्यों करेगा कोई देहदान जब मेडिकल कॉलेज ही बोलेंगे हमारे पास व्यवस्था नहीं*

*देहदान करने वाले तैयार पर सरकारी सिस्टम को लेने में आ रहा जोर*

*निलेश कांठेड़*

सरकारी कार्यप्रणाली भी अजब-गजब है,एक तरफ जोर-शोर से देहदान का संकल्प लेने की प्रेरणा दी जाती है ओर नारे लगाए जाते है देहदान महादान। दूसरी तरफ,कोई देहदान का संकल्प लेने के बाद जब देह त्याग करता है ओर परिजन उसकी इच्छा अनुरूप देहदान के लिए तैयार होते है तो सरकारी सिस्टम लेने में ही किन्तु-परन्तु करने लग जाता है ओर चिकित्सा विभाग के कुप्रबंधन के कारण मानव सेवा की भावना से देहत्याग की इच्छा मन में ही रह जाती है ओर पार्थिव देह का अंतिम संस्कार करना पड़ता है। हाल ही भीलवाड़ा में एक वरिष्ठजन शांतिलालजी मूंदड़ा की मृत्यु हो गई। मूकबधिर विद्यालय के संस्थापक शांतिलालजी के देहदान करने का संकल्प ध्यान में रखते हुए उनके परिजन भीलवाड़ा के सरकारी मेडिकल कॉलेज पहुंचे तो उनसे कहा गया कि शव सुरक्षित रखने वाली मशीन ही 15 दिन से खराब पड़ी है आप अन्यत्र लेकर जाए। परिजनों ने दिवंगत की देहदान की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए चित्तौड़गढ़,अजमेर ओर उदयपुर मेडिकल कॉलेज तक सम्पर्क किया पर कोई भी पार्थिव देह को लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। ये कोई पहला उदाहरण नहीं है जब सरकारी मेडिकल कॉलेजों ने देहदान करने का संकल्प लेने वालों का शव लेने से ही इंकार कर दिया। ऐसा कुछ माह पूर्व इस आलेख के लेखक के साथ भी हो चुका है जब पूज्य पिता बंशीलालजी कांठेड़ का देहावसान होने पर उनकी इच्छानुरूप देहदान करने के लिए हम तैयार थे तो भीलवाड़ा मेडिकल कॉलेज के एनॉटोमी विभाग ने देह गल जाने ओर बेड सॉल हो जाने जैसे तर्क देकर शव लेने से इंकार कर दिया। ये हालात उस शासन-प्रशासन व सरकारी तंत्र की कलाई खोल देने के लिए पर्याप्त होने चाहिए जो एक तरफ मेडिकल कॉलेजों में बेहतर चिकित्सकीय शोध कार्य के लिए देहदान की प्रेरणा प्रदान करता है ओर इसके लिए रैलियां व गोष्ठियां आदि के आयोजनों पर भी खूब धनराशि खर्च की जाती है। ये भी कहा जाता है कि यदि पर्याप्त मानव देह नहीं मिली तो मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के शोध कार्य में परेशानी आएगी ओर देहदान किस तरह मानव सेवा के लिए महान कार्य है यह भी बताया जाता है। यहां सवाल ये है कि कथनी ओर करनी में इतना अंतर क्यों है ओर कोई परिजन की मृत्यु पर उसकी भावना के अनुरूप देहदान करना चाहे तो उसका स्वागत करने की बजाय लेने में असमर्थता क्यों जाहिर की जाती है। मेडिकल कॉलेज संचालन के नाम पर हर वर्ष करोड़ो रूपए व्यय होते है ओर वहां पार्थिव देह सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है तो ये चिकित्सा तंत्र के लिए शर्मनाक हालात माने जाएंगे। ऐसे हालात में भविष्य में कोई क्यों अपने मृत परिजन का देहदान करने के लिए आगे आएगा ओर कोई क्यों मृत्युपरान्त देहदान का संकल्प लेगा। होना तो ये चाहिए कि जो देहदान की भावना रखते है उनकी मृत्यु होने पर सरकारी तंत्र तुरन्त उसकी पार्थिव देह को सुरक्षित मेडिकल कॉलेज तक पहुंचाने की व्यवस्था करे ओर यदि निकटतम मेडिकल कॉलेज में जरूरत नहीं है तो उसे अपने स्तर पर जिस जगह जरूरत है वहां पहुंचाए न कि शोक संतप्त परिजनों को ये सुनाया जाए कि हमे तो जरूरत नहीं है आप कहीं ओर ले जाओ। ये संवेदनहीन रवैया देहदान की प्रेरणा प्रदान करने की अलख जगाने वालों के लिए भी घातक है। कोई कितनी भी बीमारी के बाद देह का त्याग करे उसका पूरा शरीर कभी खराब नहीं हो सकता शरीर का कोई अंग तो ऐसा रह ही जाता है जिसका उपयोग चिकित्सकीय शोध कार्य में आ सकता है। ऐसे में अपने दिवंगत परिजन का देहदान करने की भावना रखने वालों को तर्क-कुतर्क के सहारे हतोत्साहित नहीं कर उनका ऐसी भावना रखने के लिए प्रशंसा ओर हौंसला अफजाई करनी चाहिए ओर पार्थिव देह किस तरह लेने से बचा जाए ये सोच रखने की बजाय किए तरह काम आ सकती ये सोच रखते हुए स्वीकार करनी चाहिए। पार्थिव देह स्वीकार करने से कतराने वालों के प्रति भी सरकार को जिम्मेदारी तय करनी चाहिए ओर जरूरत पड़ने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मिसाल भी पेश करनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई मेडिकल कॉलेज किसी पार्थिव देह को लेने से इंकार नहीं कर सके।

*स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक*
पूर्व चीफ रिपोर्टर,राजस्थान पत्रिका,भीलवाड़ा
मो.9829537627

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