इंजीनियर से महंत बने रामगिरी जी महाराज, हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में मिली महंताई की चादर
भीलवाड़ा। श्री पंचमुखी दरबार के सामने स्थित प्राचीन शिवालय मंदिर के संत को धौलपुर जिले के मुड़ीक स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर के महंत द्वारा अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए महंत पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं एवं संत-महात्माओं की उपस्थिति में उन्हें महंताई की चादर ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
विशेष बात यह है कि महंत रामगिरी जी महाराज ने इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के बाद संन्यास का मार्ग अपनाया। वर्तमान में उनके सानिध्य में भीलवाड़ा का प्राचीन शिवालय मंदिर एक विशाल एवं सुव्यवस्थित धार्मिक परिसर के रूप में विकसित हुआ है।
महंताई समारोह में , , , सहित देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों से आए अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे। इसके अलावा धौलपुर, भरतपुर एवं करौली जिलों के जनप्रतिनिधियों, पंच-सरपंचों तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भी समारोह में भाग लिया।
महंत रामगिरी जी महाराज का जन्म ब्रजभूमि के राधारानी धाम क्षेत्र के गजु (जमनानगर) गांव में हुआ। बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के प्रति उनकी विशेष रुचि रही। इंजीनियरिंग शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने दिल्ली सरकार में राजकीय सेवा भी दी। बताया जाता है कि दिल्ली-गाजियाबाद के प्रथम सड़क पुल के निर्माण कार्य में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
भीलवाड़ा आगमन के बाद उन्होंने प्राचीन शिवालय मंदिर श्री मंशापूर्ण महादेव (जतीजी की कुई) के जीर्णोद्धार का कार्य कराया। मंदिर परिसर का विस्तार, गौशाला निर्माण तथा गौसेवा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। वर्तमान में गौशाला में सैकड़ों गौमाताओं की नियमित सेवा की जा रही है। प्रकृति संरक्षण एवं धार्मिक सेवा कार्यों के कारण वे क्षेत्र में विशेष पहचान रखते हैं।
धौलपुर से महंत पद ग्रहण कर भीलवाड़ा लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के बद्रीलाल सोमानी, माहेश्वरी समाज के पूर्व अध्यक्ष रामेश्वर इनाणी, शिवलाल डिडवानिया, सत्यनारायण सोनी, प्रहलाद काल्या, शिवराम पटेल, ओमप्रकाश अग्रवाल, मेवालाल खटीक एवं प्रहलाद अजमेरा सहित अनेक गणमान्य नागरिकों ने भगवा दुपट्टा पहनाकर उनका अभिनंदन किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया।
महंत दिगम्बर धर्मगिरी जी महाराज द्वारा अपने शिष्य रामगिरी जी महाराज को उत्तराधिकारी एवं महंत घोषित किए जाने को श्रद्धालुओं ने धार्मिक परंपरा एवं गुरु-शिष्य परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
— मोनू सुरेश छीपा
संपादक, The Voice of Rajasthan
